‘कोरोना’ संकट में भी अंकगणित के फेर में ‘कांग्रेस’

सुरेश शर्मा

भोपाल। जब पूरा देश कोरोना संकट से जूझ रहा है। विश्व इसे महामारी मानकर समाधान खोज रहा है। लॉकडाउन के निर्णय लेने में भारत की सरकार और खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और निर्णय लेने की क्षमताओं और उनकी बात को देश में स्वीकारोक्ति की तारीफ हो रही है तब कांग्रेस को अंकगणित ही क्यों दिखाई दे रहा है? इस संकटकाल में भी कांग्रेस महान लेकिन बूढ़े अर्थशास्त्री और अधिकारी से राजनेता बने मनमोहन सिंह को टीवी पर लाकर उनके विश्वास सेे राजनीतिक लाभ कामने का प्रयास कर रही है। सोनिया गांधी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए पांच ठोस सुझाव देती है लेकिन वे केवल अपनी खीज निकालती हैं और मीडिया इंडस्ट्री और पत्रकारों को आर्थिक चोट देने की बात करती हैं। राहुल गांधी अपने अंकगणित का प्रदर्शन करते हैं और उन्हें तो हर बात में लेन-देन ही दिखाई देता है। वे पैसों की आवक-जावक को देख रहे हैं। प्रियंका वाड्रा नये अर्थशास्त्री के तौर ख्यात होने के प्रयास करती हैं। देश उनकी इन सभी बातों को ध्यान से देख रहा है। कांग्रेस इसलिए ही कमजोर हो रही है। वह राजनीतिक नफा-नुकशान से हर विषय को देखते-देखते एक्सपोज हो रही है। समझदार नेता मौन हैं और नव समझदार अपना प्रदर्शन करके कांग्रेस को लज्जित कर रहे हैं। कांग्रेस जिस अंकगणित के बिगड़े रूप के बाद सत्ता से बाहर गई थी उसी रूप को अंगीकार करती दिख रही है।

कांग्रेस इन दिनों उहापोह में है। उसे करना क्या है यह कोई भी सलाहकार उन्हें समझाने की स्थिति में नहीं है? जब देश सकंटकाल को पार पाने के लिए दो-दो हाथ कर रहा है। जब विश्व की अर्थव्यवस्था का पहिया थम सा गया है। लोग कमाने की बजाये जान बचाने की सोच रहे हैं। ऐसे समय में खुद सोनिया गांधी और उनके दुर्योधन पुत्र (इसे केवल सत्ता लोभ तक ही सीमित रखें) को अंक गणित और अर्थशास्त्र ही दिखाई दे रहा है। कितने पैसे कहां से कहां गये और जो आना थे वे किस आधार पर आये-गये? कांग्रेस मनमोहन सिंह को इस अवस्था में भी टीवी के सामने लाकर परोस देती है। वे आज की सरकार को अर्थव्यवस्था की घूंटी देकर चले जाते हैं जबकि अर्थशास्त्र की किताब पढऩे वाले जानते हैं कि उनकी और रघुराम राजन की सोच में न तो भारत का गांव है, न ही किसान है और न ही ग्रामीण विकास। वे तो यूरोपीय देशों की नौकरी करते रहे हैं। अब इस उम्र में आकर इस बूढ़े अर्थशास्त्री को दांव पर लगाकर उनकी पुरानी इमेज को भुनाने का प्रयास कर रही हैं। यह इमेज तबकी है तब भारतीय अर्थव्यवस्था को भारत के लिए कम विदेशों के लिए अधिक उपयोग में लाया जाता था।

 

भ्रष्टाचार के हिमालय तक अर्थव्यवस्था का उपयोग करने वाले इन महानुभावों के सामने आज भारतवर्ष की अर्थव्यवस्था ही सवाल पूछ रही है कि जो आज निर्णय हो रहे हैं जिनसे देश ताकतवर हो रहा है वैसा आपने और रघुराम ने क्यों नहीं किया? कांग्रेस यही से गलत राह पर चल पड़ती है। जनता में विश्वास विपक्ष के नेता बनाने जितना भी नहीं बचा। उद्योगपतियों को चोर समझते हैं और गरीब व किसान को झांसा देकर वोट कबाडऩे का प्रयास करते हैं तब क्या यह अंकगणित कांग्रेस के पक्ष में जायेगा? सोनिया गांधी को राहुल मोह त्याग कर अनुभवी नेताओं और यशमैन के अन्तर को समझना ही होगा। नहीं तो जो हो रहा है वही जारी रहेगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button