‘कोरोना’ बाद के दुष्प्रभाव से पीड़ित ‘उपभोक्ता’

भोपाल। (सुरेश शर्मा) वह दिन याद है जब दुकान से बाहर सड़क पर रखे नमक के बोरों का दौर खत्म हुआ था। आयोडीन युक्त नमक चलन में आया था। इसे नमक न मानकर अब दवा माना जाने लगा था। रुपये किलों की कीमत न पाने वाला नमक भी अपने मूल्यों से उन दिनों इतराता था। एक पत्रकार वार्ता में मैंने सवाल पूछा था कि रुपये किलों वाला नमक सात रुपये किलो करने का क्या औचित्य है? जवाब मिला था आप घर के लिए किराने का कितने का सामन खरीदते हैं और उस राशि में नमक का प्रतिशत कितना है तब महंगा कितने प्रतिशत हुआ? यह अपने स्वास्थ्य के लिए खर्च करना कोई बड़ी बात है क्या? वही सवाल और यही उत्तर आज फिर से याद आ रहा है। कोरोना महामारी से हम निकलने के प्रोसेस में हैं। संस्थायें इसी उत्तर का सहारा लेकर हम पर बोझ बढ़ाये जा रही हैं। एक-एक करके बढ़ाये जा रही हैं। ऐसा सोच कर बढ़ाये जा रही हैं कि हमारी जेब तो अक्षय है और वह तो कामधेनु की भांति कभी रिक्त हो ही नहीं सकती। अढाणी तेल और खाद्य सामग्रियों के भाव बढ़ा रहे हैं अंबानी डेटा पर जेब काट रहे हैं। सरकार टेक्स के नाम पर और स्कूलें फीस के नाम पर जेब हल्की कर रही हैं। कोरोना मानों केवल इन्हीं संस्थाओं के लिए ही था आम उपभोक्ता के लिए तो वह वरदान बनकर आया था?

सरकार ने गरीब को मुफ्त में राशन देकर पेट भरने का इंतजाम कर दिया था लेकिन उसमें मध्यम वर्ग कहां था? वह तो यह खैरात भी नहीं ले सकता था? दो बजट आ गये केन्द्र और राज्य, इसमें भी आम आदमी को क्या मिला, जो शनै-शनै कट रही जेब को संभाल पायें? अभी स्कूलों के परिणाम भी नहीं आये लेकिन उन्होंने कोरोना की भरपाई करते हुए बेतहाशा बढ़ोतरी के साथ शुल्क वसूली का दबाव बनाना शुरू कर दिया है। परीक्षा परिणाम से पहले यदि फीस नहीं भरी तो अर्थदंड का प्रावधान कर दिया वह अलग से। साइड इफेक्ट्स का ईलाज करने के लिए जेब पहले से अधिक कट ही रही है। रेलवे सुविधाओं की वापसी की बजाए सुपर चार्ज की आड़ लेकर जेब खाली कर रही हैं। ऐसे में आम उपभोक्ता का ध्यान कौन करेगा? हमें हानि को खंड-खंड करके समझाया जाता है लेकिन आखिरकार हमारी जेब तो एक ही है। उनका खंड-खंड हमारा तो अखंड है। कोरोना में कर्मचारियों का वेतन काट लिया था अभी तक पुरानी स्थिति में नहीं आया है। जिनका रोजगार गया था वे अभी वापसी नहीं कर पाये हैं। सरकार का मैकेनिज्म ऐसे आंकड़े उगलता है कि हरा ही हरा पेश कर दिया जाता है।

प्रति व्यक्ति आय एक लाख के करीब हो गई लेकिन इसे ढ़ूढ़ो तो कहीं है ही नहीं। मृग मारीचका की भांति है खुशबू तो आ रही है लेकिन पकड़ में नहीं आ रही। सपनों से कर्जजाल में फंस गये थे अब तो किस्त जमा कराने के हालात नहीं हैं। अफसर पूछते हैं पहले तो आपकी गाड़ी का चक्का इतने चक्कर लगाता अब कम क्यों हैं? उनको क्या उत्तर दें कि जेब तो ऐसे खाली को रही है जैसे मुट्ठी से रेत? ऐसे में कोरोना बाद के दुष्प्रभाव केवल संस्थागत ही हैं यह मानने की बजाए उपभोक्ता के दोहरे दुष्प्रभाव पर भी विचार करना चाहिए। उसे कोरोना ने तो मारा ही है अब कोरोना के बाद के महा कोरोना भी कोई कम नहीं मार रहा है? उनसे बचाने कोई अवतार थोड़े ही लेगा।

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