‘केजरीवाल’ की नजर में अन्ना भी हो गये ‘भाजपाई’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। लोकपाल को लेकर देश के सबसे बड़े अन्ना आन्दोलन से एक राजनीतिक पार्टी का उदय हुआ था। आम आदमी पार्टी के मुखिया के रूप में अरविंद केजरीवाल को नामित करके एक समूह तैयार किया गया था। मोटेतौर पर यह माना गया था कि ये एनजीओ वालों का समूह है जो आन्दोलन के पीछे थे। हालांकि यह भी सबको पता है कि अन्ना हजारे ने राजनीतिक पार्टी बनाने का पहले समर्थन नहीं किया था लेकिन नीतियों को समझने के बाद हां भर दी थी। इसलिए यह अन्ना आन्दोलन की कोख से निकली राजनीतिक पार्टी कहलाई गई। इसका लाभ भी उसे मिला। ईमानदारी और संघर्ष की प्रतीक यह राजनीतिक पार्टी पहले चुनाव में दिल्ली में गुल खिलाती दिखी लेकिन दूसरे चुनाव में अप्रत्याशित बहुमत लेकर सरकार में आई। पांच साल की सरकार देने के बाद फिर से हुए चुनाव में कमोवेश वही ताकत वापसी में मिली। केजरीवाल ने दो काम साथ जारी रखे। पहला हर किसी को बेइमान कहना और खुद को सबसे अधिक ईमानदार। दूसरा किसी भी गलती की टोपी नरेन्द्र मोदी पर डालने का प्रयास। दूसरा प्रयास आज तक चल रहा है। केजरी के मंत्री धरे जा रहे हैं तब उसे मोदी ने सीबीआई को भेजा है कि पकड़ो और कोई गलती तो निकालो जैसे जुमले दिये जा रहे हैं।

एक बात और केजरीवाल की रही कि उन्होंने साथ चलने वाले सभी समझदार लोगों को निकाल बाहर किया गया। प्रशान्त भूषण, योगेन्द्र यादव और कुमार विश्वास इसके उदाहरण हैं। अब जिस प्रकार के लोग हैं वे जैसे हैं सबको पता है। अब नया घटनाक्रम चल रहा है। शराब नीति की देशव्यापी आलोचना हो रही है। ईमानदारी का प्रमाण पत्र बांटने वाले आप के नेता खुद आरोपों से रूबरू हो रहे हैं। इसलिए तोता रटंत जैसी स्थिति बनाये हुए हैं। जो हुआ उसका कोई जवाब नहीं जो हो रहा है वह मोदी के कहने पर हो रहा है। प्रधानमंत्री जी सीबीआई को कह रहे हैं मनीष को हरहाल में पकड़ो। अब अन्ना का एपीसोड शुरू हो गया। अन्ना हजारे ने एक पत्र लिखकर केजरीवाल को निशाने पर लिया है। उन्होंने शराब नीति को निराशाजनक बताया है।  साथ में यह भी कह दिया है कि आन्दोलन के समय जो तय हुआ था वह करने की बजाए शराब पर सरकार केन्द्रीत हो गई। यह सत्ता का नशा है। जैसा कि आप के नेताओं का राजनीति करने का तरीका है उससे वे सुझाव, आरोप और विरोध करने वालों को तत्काल भाजपा का होने का आरोप लगा देते हैं। ऐसा ही अन्ना के साथ कर दिया।

केजरीवाल ने अपने गुरू को भाजपा से मिला हुआ बता दिया। यह भी जड़ दिया कि यह पत्र भाजपा वालों ने अन्ना से लिखवाया है। इस गांधीवादी व्यक्ति जिसमें सिद्धान्त बड़ी हद तक हैं भरे कोई राजनेता चि_ी लिखवा ले जाये अचरज वाली बात है। अन्ना के पत्र के बाद केजरीवाल की राजनीति प्रभावित होगी और जनता में अविश्वास का भाव पैदा होगा इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। यही भय आप के नेताओं को सता रहा है इसलिए राजनीति का हर हथकंडा अपनाया जा रहा है। मोदी करवा रहा है और अन्ना ने भी भाजपा के कहने पर पत्र लिखा है यह सब इसी का हिस्सा है?

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