कुंभ में कोरोना :  प्रतिकात्मक होंगे शेष आयोजन

नई दिल्ली ( विशेष प्रतिनिधि )। खबर जिस भी प्रदेश की देखने का प्रयास करिए कोरोना का बढ़ता प्रभाव और मौतों का तांडव दो ही प्रकार के समाचार मिलते है। प्रशासन तंत्र सभी प्रकार की व्यवस्थाएं जुटाने में लगे हैं इसके बाद भी कोरोना नियंत्रण मैं नहीं आ रहा है। सभी आयोजनों पर शासकीय अंकुश लगा हुआ है लेकिन विधानसभा के चुनाव और कुंभ का आयोजन सरकार के दृष्टि से ओझल हो रहा है। पिछले दिनों से बंगाल चुनाव को लेकर यह प्रस्ताव विचार के लिए आ रहा है कि शेष चरण के चुनाव को एक साथ ही करा लिया जाए। लेकिन चुनाव आयोग इसके लिए तैयार नहीं हो रहा है। हरिद्वार कुंभ में कोरोना की दखलअंदाजी, महामंडलेश्वर जैसे महत्वपूर्ण संतों का निधन और आम जनता में कोरोना का असर साफ दिखाई दे रहा है। कुछ अखाड़ों ने अपनी वापसी का एलान कर दिया फिर भी सरकार कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। कुंभ और कोरोना का द्वंद इतना आगे जाएगा यह सवाल सहज रूप से उठ रहा है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी महाराज से फोन पर बात कर संतो के स्वास्थ्य की जानकारी ली। इस जानकारी लेने के प्रयास में वह सब कुछ छुपा हुआ था। जिसमें संत समाज का सम्मान भी निहित है और कोरोना की भयावह स्थिति का संदेश भी।
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस एक फोन में समस्त साधु समाज में एक विशेष हलचल पैदा कर दी। अवधेशानंद गिरी महाराज ने अपने अखाड़े के संत जनों से बात करके निर्णय लिया कि कुंभ के लिए जिन देवताओं का आह्वान किया गया था उनका विसर्जन कर दिया जाए। साधु संत जहां से पधारे हैं वहां वापस पहुंचे। जिन तीन अखाड़ों को कुंभ स्नान करना शेष रह गया है वे प्रतीकात्मक रूप से आयोजन को संपन्न कर ले। यह संदेश भी प्राप्त हुआ है कि सभी संतो ने, अखाड़ा प्रमुखों ने इस बात में अपनी सहमति जताई है।  इससे यह समाचार निकल कर सामने आता है कि हरिद्वार कुंभ का शेष हिस्सा प्रतीकात्मक रूप से संपन्न होगा।
 
एक-दो दिन में वे अपने मूल स्थानों पर लौट जाएंगे। लेकिन इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि कुंभ के कार्यक्रम थम जाएंगे। सूत्रों का कहना है कि जिन अखाड़ों की पेशवाई और स्नान हो गया है वह कुंभ से विदा ले रहे हैं। जबकि बैरागी, उदासीन और निर्मल तीन अखाड़ों के स्नान और पेशवाई शेष है। इनमें दमदार अखाड़े भी शामिल हैं। जिनसे सरकार कोई पंगा लेने की स्थिति में नहीं है। सूत्र बताते हैं कि यह तीनों अखाड़े अपने आयोजन को पूरा करेंगे चाहे सांकेतिक रूप से ही क्यों न करें। सांकेतिक भी तब होगा जब सरकार और प्रशासन उनके समक्ष आग्रह करें और वह उस आग्रह को स्वीकार करें। ऐसा आग्रह स्वंय प्रधानमंत्री ने कर लिया है। कुंभ की परंपरा का पालन करने की जिद अखाड़ों की हमेशा रही है। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा यह माना जा सकता है।
 
सामाजिक क्षेत्रों में यह बहस जरूर शुरू हो गई है कि जब कोरोना जैसी महामारी अपने चरम पर पहुंच रही है। दो लाख से अधिक संक्रमित रोजाना आ रहे हैं। ऐसी स्थिति में किसी बड़ी भीड़ वाले जमावड़े की अनुमति नहीं दी जाना चाहिए। लेकिन कुंभ आयोजन में पधारे दुर्लभ साधु संत इन शासकीय व्यवस्थाओं के अंतर्गत कितना स्वमं को स्वीकार करेंगे यह यक्ष प्रश्न है। सूत्र बताते हैं कि कुंभ के आयोजन में सहभागिता के लिए वह सिद्ध संत भी आते हैं जो इन अवसरों के अलावा कभी दिखाई नहीं देते। प्रश्न यह उठाया गया है कि राम मंदिर का आंदोलन हो या मतदान की व्यवस्था कुंभ में दिखने वाले साधु कभी दिखाई नहीं दिए। बे कहां से आते हैं, कहां जाते हैं यह भी रहस्य की बात है ऐसे में धर्मसत्ता व राजसत्ता की बात को कितना स्वीकार करेगी यह चिंता राजसत्ता के पास है।
 
देश भर में सभी महत्वपूर्ण आयोजन बंद हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कुंभ का यह धार्मिक आयोजन अपने इसी स्वरूप में चलता रहे या सूक्ष्म व सांकेतिक रूप से करके संपूर्ण कर लिया जाए। जब कुंभ पर सवाल उठ रहे हैं ऐसे में लाजमी है कि विधानसभा के उपचुनाव पर भी यह सवाल उठेंगे ही। बंगाल में चार चरण का मतदान हो चुका है और पांचवें चरण का मतदान कल संपन्न हो जाएगा  अनेकों राजनीतिक दल सामाजिक संगठनों और कोरोना से निपटने वाले टास्क फोर्स की ओर से यह सुझाव आया है कि बाकी के तीन चरणों को एक साथ पूर्ण कराकर विधानसभा चुनाव की पूर्णाहुति करा ली जाए। लेकिन चुनाव आयोग इस सुझाव से सहमत दिखाई नहीं दे रहा है। आने वाले समय में क्या निर्णय होता है यह देखना है? फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि अव्यवस्था और मौतों के लिए ना तो चुनाव आयोग जिम्मेदार होता है नहीं न्याय व्यवस्था, जो निर्देश देने की ताकत रखते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button