‘कितनों’ पर और लग जाता फिर दूसरा ‘दाग’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सुरक्षा की चूक को लेकर राजनीति भी गरम है और प्रशासन में कसरत भी तेज है। पंजाब सरकार और कांग्रेस ने अपनी राजनीति कर ली अब केन्द्र सरकार की बारी है। वह अपना काम करेगी इसमें राहत की बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी सुरक्षित हैं। इसी बीच एक और इन्ट्री हुई है, किसान नेता राकेश टिकैत की। उन्होंने भाजपा के सुरक्षा की चूक, कांग्रेस के कुर्सी खाली के बीच में टवीट किया है कि कहीं यह किसानों का आक्रोश तो नहीं है इसकी जांच होना चाहिए। इस इन्ट्री ने एक बार फिर विवश कर दिया है कि इस बात पर विचार किया जाये कि आखिर किसान आन्दोलनकारी प्रधानमंत्री की कीमत पर अपनी मांग मनवाने के लिए दबाव बना सकते हैं? जबकि सरकार ने उनकी सभी मांगों को मान लिया है। यह केवल किसान आन्दोलन नहीं हो सकता है यह फिर से दाग की तैयारी थी। पहला दाग यह कि क्या गणतंत्र दिवस पर किसानों के नाम पर या किसानों द्वारा जो हुआ था वैसा ही शर्मनाक मामला होने जा रहा था? दूसरा पंजाब एक प्रधानमंत्री की हत्या का आरोप धो नहीं पा रहा है दूसरा दगा भी स्वीकार करने को तैयार हो रहा था? तीसरा क्या सिखों का नरसंहार करने वाली कांग्रेस एक बार से सिखों को प्रधानमंत्री के सामने खड़ा करके कौम की प्रतिष्ठा को दाव पर नहीं लगा रही थी?

राकेश टिकैत को तो अपनी रोटी पर दाल लेने की आदत हो गई है। उन्हें शायद ही यह अहसास हो कि यह किसान आन्दोलन के लिए कोई सुखद बात नहीं है कि प्रधानमंत्री के जीवन के साथ खेलते हुए आन्दोलन किया जाये? यह भी कोई सुखद नहीं है कि किसानों की समस्या का समाधान करवाने के लिए किसी भी प्रकार की राजनीति का हिस्सा बना जाये। लाल बहादुर शास्त्री, संजय गांधी, माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट जैसी अनेक  हत्याओं का सूत्रधार कौन है कभी तथ्य सामने नहीं आये? क्या पंजाब में प्रधानमंत्री के जीवन को दांव पर लगाने की योजना थी? इस विषय को केवल राजनीति एंगल से सोचने की बजाये सुरक्षा एजेंसियों को भी सवालों के दायरे में लाने की जरूरत है। जिस पंजाब में प्रधानमंत्री की सभा को बिगाडऩे की योजना का सबको पता चल गया था फिर इतना लम्बा सडक़ मार्ग तय करने की क्या जरूरत थी? जब मौसम खराब था तब मौसम सडक़ मार्ग के लिए अच्छा कैसे हो सकता है? इस प्रकार के सवाल राजनीति से इतर भी हैं। लेकिन जो हुआ उससे किसान भी दागिल हो रहे हैं। पंजाब पर भी दाग लग रहे हैं और कांग्रेस पर तो लग ही रहे हैं।

सुरक्षा की लापरवाही को रैली की असफलता से जोडऩे के प्रयासों को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? क्योंकि चुनाव प्रचार का आधार तो सहज बनता है जबकि प्रधानमंत्री तो हजारों करोड़ की सौगात पंजाब को देने गये थे। जिसे पंजाब को नहीं देने दिया गया। क्या किसान आन्दोलन के कारण पंजाब नफरत की आग में जल रहा है? यह नफरत खूनी हो सकती है? सवाल बहुत है लेकिन टिकैत की सोच, सुरक्षा एजेंसियों की कमजोरी, कांग्रेस की राजनीति का स्तर और पंजाब को दागी बनाने का खेल सहित कई ऐसी बातें पर हैं जिन पर खुल कर बहस करने की जरूरत है। हम सब आनंद बस इसी बात का कर सकते हैं कि देश के प्रधानमंत्री सुरक्षित हैं।

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