‘कर्जदार’ प्रदेश को केन्द्र सरकार की चोट का ‘बजट’

भोपाल। आमतौर पर बजट में यह नहीं कहा जाता है कि केन्द्र सरकार ने राज्य को पैसा देने में कंजूसी की है। लेकिन बजट भाषण के बिन्दु क्रमांक 9 में यह साफ कहा गया है कि केन्द्र सरकार ने राज्य के हिस्से का 2 हजार 677 करोड़ रुपया काट लिया है। जिससे राज्य को विकास कार्य करने के लिए परेशानी आयेगी। जब वित्तमंत्री तरूा भनोट से सवाल पूछा गया कि इसका कारण क्या है? तब उन्होंने यह नहीं बताया कि पहले मिली राशि खर्च नहीं या हिसाब नहीं दिया। इस गोलमाल जवाब में प्रशासन की कमजोरी को छिपाने का प्रयास और इससे राजनीतिक लाभ मिल जाये इसकी मंशा साफ दिख रही थी। एक बात और हुई। कर्ज को लेकर। प्रदेश में 31 मार्च 2018 की स्थिति में कर्जा 1 लाख 52 हजार 745 करोड़ का कर्जा था। अब वह 1 लाख 80 हजार 288 करोड़ हो गया। वित्तमंत्री ने कहा कि कर्जा जिस सरकार को मिलता है यह उसकी साख का दर्शाता है लेकिन सवाल यह है कि उसका उपयोग कैसे किया जा रहा है। लेकिन जब वित्तमंत्री भनोट से पूछा गया कि  कर्ज का खर्चा करने के लिए ब्यूरोक्रेशी दोषी है या राजनेता। तब वे गोल कर गये। इसलिए यह कहना कि केन्द्र सरकार ने राज्य के राजस्व को रोका है यह तर्क गले नहीं उतर रहा है। इस बाजट की एक और बात है जो आर्थिक सर्वेक्षण में भी दिखाई दी वह यह है कि सरकार की मशा पिछली सरकार की नाकामी बताकर अपनी कामयाबी दिखाने की है।
इस बार का बजट भी 732.63 करोड़ के आधिक्य का बजट है। मतलब आय की तुलना में व्यय कम है। मतलब सरकार काम करना नहीं चाहती है। जिससे राशि बच रही है। वैसे भी प्रदेश की सरकार के पास महज 32 हजार करोड़ रूपये ही विकास कार्यों के लिए बचते हैं। किसानो की कर्जमाफी के लिए सरकार ने 8 हजार करोड़ का प्रावधान किया है। अभी तक जो कर्जामाफ किया है वह बैंक में राशि के विवाद का सेटलमेंट अधिक है जिसका किसान को लाभ होने की बजाये बैंकों को लाभ हुआ है। एक बात और महत्वपूर्ण है कि कर्जा तो बढ़ गया लेकिन ब्याज का प्रतिशत कम हो गया। इसे कम दिखाने के लिए भी आंकड़ों का मेन्युप्लेशन किया गया है। राजस्व प्राप्तियों को पिछले साल की तुलना में अधिक दिखाया गया है। जिससे ब्याज का प्रतिशत अपने आप कम हो जाता है। यह बात सही है कि प्रदेश की माली हालत में सुधार हो रहा है। क्योंकि जब पेट्रोल और डीजल के भावों में 2 रुपये की बढ़ोतरी की गई है तब उससे राज्य के खजाने में 1400 करोड़ की शुद्ध आय हुई है। याने कि आम आदमी की जेब से एक साल में इतनी राशि सरकार निकाल लेगी।
नये करो का कोई प्रावधान बजट में नहीं किया गया है। यह इसलिए भी महत्वपूण है कि ऐसा करने का अधिकार एक तो सीमित हो गया और दूसरा नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने एक ऐसा सवाल दाग दिया कि जब सदन आहुत करने की अधिसूचना जारी हो जाती है तब सरकार कोई करारोपण नहीं कर सकती? यदि परिस्थितवश करना भी पड़ता है जब सदन की जानकारी में लाया जाता है। यह सरकार ने चक की है। अध्यक्ष ने बात को संभाल लिया। चूंकि सरकार कर्जमाफी के मामले में उलझी हुई है और किसान उसकी बात अपने हिसाब से सोच रहा है तब बजट को किसानोन्मुखी दिखाने का प्रयास किया गया है। यह बजट विवादित नहीं है।

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