‘करोड़’ को तो रोड़ पर ला दिया कौशलवान ‘नेताओं’ ने

भोपाल। जब भी मित्रों के बीच आपसी संवाद होता है और बीते हुए समय पर चर्चा केंद्रित होती है तब ऐसी बातें निकल कर सामने आती हैं जिन्हें आज के संदर्भ में सोचते हैं तो उसके बड़े अर्थ निकलते हैं। ऐसा ही एक प्रसंग आज चर्चा में आया जब हमारे पुराने मित्र में अपने जीवन की परिवर्तन वाली घटना को साझा किया। उन्होंने कहा कि 25 हजार की रकम मिलने से जीवन की दिशा ही बदल गई। संकट के बादल टल गए और जीवन में व्यवस्थाएं प्रारंभ हो गई। उसी वक्त दूसरे मित्र ने कहा एक छोटा सा अनुबंध मेरे जीवन को बदलते हुए प्रगति की राह पर ले गया। यह एक बार का संदर्भ है कहां मात्र 25 हजार की राशि से जीवन परिवर्तन और कहां आज करोड़ भी रोड पर दिखाई दे रहे हैं। वह दिन सबको याद होगा जब सेना के शौर्य प्रदर्शन में शहीद हुए हमारे जांबाज को एक करोड़ रुपए की राशि दिए जाने का प्रावधान किया था। सीमा की रक्षा कर हमें चैन की नींद देने वाले इस शूरवीर के सम्मान में एक करोड़ की राशि गर्व देती थी। आज नेताओं की कुशलता और राजनीतिक स्वार्थ इतना चरम पर पहुंच गया है कि अपराध और अपराध की घटनाओं के बीच मृत्यु के लिए भी एक करोड़ की राशि मांगी जाती है। जब मंदसौर गोली कांड के मृतक किसानों को एक-एक करोड़ की राशि दी गई थी। यह राहत राशि नेताओं की मांग का दायरा बढ़ाने में मील का पत्थर बनती जा रही है।
मध्य प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले में, मतलब महू में एक आदिवासी युवती की मौत या हत्या का मामला इन दिनों राजनीतिक सुर्खियों में बना हुआ है। सरकार का पक्ष है लडक़ी आरोपी के साथ ही रहती थी। करंट लगने से उसकी मौत हो गई। विपक्ष कह रहा है हत्या की गई है। पुलिस पहले हत्या का मामला दर्ज करने में आनाकानी करती है लेकिन बाद में कर लेती है। इससे विषय वस्तु संदिग्ध हो जाती है। इस सारे मामले में पुलिस को सहायक के रूप में मानना चाहिए या शत्रु के रूप में? इसका निर्णय समाज अपने हिसाब से करता है। थाने पर प्रदर्शन, तोडफ़ोड़ और आगजनी की घटना यह बताती है कि समाज ने पुलिस को शत्रु के रूप में मान लिया। बचाव में चली गोली से एक युवक की जान चली गई जो दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन गोली चलने के बाद न तो वे दोषी को देखती है और ना निर्दोष को। वह तो जहां लगती है कोहराम मचा दी है। अब राजनीति जो न करा दे वह कम है।

सरकार ने मृतक के परिवार को 10 लाख देने की घोषणा की। यह मौत की कीमत नहीं बल्कि आर्थिक अव्यवस्थाएं पैदा हो गई, उनसे निपटने का मार्ग है। मौत पर तो न्यायालय निर्णय करेगा। एक परिजन को सरकारी नौकरी दिए जाने का आश्वासन भी दिया गया। लेकिन विपक्ष 10 लाख की जगह एक करोड़ देने की मांग कर रहा है। अब करोड़, करोड़ न होकर कोई रोड छाप शब्द हो गया है। क्या हर घटना को चाहे वह आदिवासी की हो या किसान की सैनिक के शौर्य की राशि के समान खड़ी कर देना उचित होगा? अब कुछ दिन बाद ही यह मांग उठेगी कि शहीद की राशि कई करोड़ कर देना चाहिए? कुल मिलाकर बात यह है कि सरकार अपनी खामियों को राजनेता अपने राजनीतिक स्वार्थ को राज के खजाने से पाटने का प्रयास कब तक करते रहेंगे?

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