कमलनाथ सरकार को बचाने की तैयारी अब दूध की रखवाली बिल्ली करेगी !

[रामभुवन सिंह कुशवाह] कर्नाटक के बाद अब मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकार संकट में है। राजनीति में अमूमन इस तरह की संभावना विपक्ष या मीडिया व्यक्त करता है और सत्तारूढ़ दल दावा करता रहता है कि उसकी सरकार पूर्णत: सुरक्षित है। पर यहाँ उल्टा है। कांग्रेस लोकसभा में और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भोपाल में इस तरह की आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि केंद्र सरकार मध्यप्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रही है। भाजपा भलें हीं इसका खंडन करती रहे और यह कुछ सीमा तक सही भी है कि  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहीं भी स्पष्ट बहुमत के अभाव में  लचर और लाचार सरकार बनाने के पक्ष में नहीं हैं पर राजनीति तो संभावनाओं का खेल है यहां  जो दिखाता है वैसा होता नहीं है।
कल जब कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने लोकसभा में राहुल गांधी और सोनिया गांधी की मौजूदगी में सदन का बहिर्गमन करते हुए आरोप लगाया था कि कर्नाटक जैसी स्थिति मध्यप्रदेश में भी बनाई जा रही है। तब से मध्यप्रदेश में भी परिवर्तन की सुगुबुगाहट शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री कमलनाथ सतर्क हुये तो विधायकों को विधानसभा में अनिवार्य उपस्थिति के लिए व्हिप जारी किया गया और निर्दलीय तथा सपा-बसपा विधायकों को सत्र के बाद मंत्री बनाए जाने का आश्वासन दिया जाने लगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया से एक दिन के लिए भोपाल आने का अनुरोध किया गया और वे 11 जुलाई को आ भी रहे हैं। पर सबसे बड़ी दिलचस्प बात यह हुई कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने सभी पूर्व निर्धारित दौरे निरस्त कर घोषणा की कि अब वे अपना पूरा समय और ध्यान कांग्रेस के विधायकों को सम्हालने और कमलनाथ को बचाने में लगाएंगे। यह जरूरी भी था किंतु वहीं कहा जाने लगा कि अब बिल्ली ने दूध की रखवाली करने की जि़म्मेदारी ले ली है। 
क्योंकि राजनीति में सदैव दो और दो चार नहीं होते वे आठ भी हो सकते हैं और शून्य भी रह सकते हैं। क्योंकि राजनीति गणित का खेल होते हुये भी जोड़ घटाने के साथ ही गुणा-भाग का भी खेल होता है। क्योंकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा दोनों की कोई एक धुरी  ऐसी है जिस पर दोनों की राजनीति घूमती हैं तो वह दिग्विजय सिंह ही हैं। जो वर्तमान में घायल शेर की तरह अपनी व्यथाएं छुपाकर गांधी परिवार के प्रति निष्ठा व्यक्त करने को मजबूर हैं। वे यह भी जानते होंगे कि निष्ठा का राजनीति में कोई अर्थ नहीं होता क्योंकि वे राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले स्व. अर्जुन सिंह से प्रशिक्षित हैं और उनके समर्थन तथा विरोध के झटके झेलकर कुशल राजनेता बन चुके हैं परंतु जब राजनीतिक पुरुषार्थ निरर्थक हो जाएं और महाभारत का घायल योद्धा 'भीलन लूटीं गोपिका वही अर्जुन वही वाणÓ की तरह अपनी राजनीति की महत्वाकांक्षाएं लुटती  देखने को मजबूर हो तो 'कुछÓ तो करेगा ही वह अपना 'दिग्विजयी युद्धपोतÓ को राहुल और ज्योतिरादित्य जैसे राजनीति के कच्चे और अनाड़ी खिलाडियों के हाथों कैसे ढूबने देगा? पर दिग्विजय सिंह यह कैसे भूल सकते हैं कि यह वही कमलनाथ हैं जिन्होने उन्हें भोपाल में लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए मजबूर किया था। यदि वे राजगढ़ से चुनाव लड़ते तो आज वे भी लोकसभा में बैठकर देश की राजनीति कर रहे होते और कांग्रेस की वर्तमान 'जग हँसाईÓ में महत्वपूर्ण किरदार निभा रहे होते। 
राजनीति के अध्येताओं और रुचि रखने वालों को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि यह वही कमलनाथ हैं जिन्होने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के कान भरकर दिग्विजय सिंह का दिल्ली में रुतबा कम ही नहीं तो एक प्रकार से बर्बाद ही किया है। किसे  नहीं मालूम कि एक समय वे राहुल गांधी के प्रमुख सलाहकर महामंत्री और एक तरह से कांग्रेस के प्रमुख तारणहार हुआ करते थे। यह कौन भूल सकता है कि कांग्रेस ने जिन वोट समीकरणों पर 50-55 साल एकछत्र राज्य किया उसके वर्तमान में कोई एक अनुयायी अलम्बर नेता हैं तो वह दिग्विजय सिंह ही हैं। उन समीकरणों के लिए उन्होंने बहुत बड़ा त्याग किया है। और यही नहीं उन्होंने अपनी मूल पारिवारिक मूल जन्मजात छवि को उसके लिए होम दिया है। यह उनकी कांग्रेस और गांधी परिवार के प्रति एकनिष्ठ निष्ठा ही थी कि उन्होने अपने पिता और पितामह पीपा जी महाराज की पृष्ठभूमि को एक तरफ रखकर स्वयं को राजनीति का खलनायक कहलाना स्वीकार किया और अपनी छवि हिन्दू और सवर्ण विरोधी बनाने में किंचित भी संकोच नहीं किया। क्योंकि वे स्वयं को गांधी परिवार के वफादार सिपाहसालार सिद्ध करना चाहते थे इसलिए उन्होंने अपने कई शुभचिंतकों की सलाह को दरकिनार किया और आज उसका परिणाम वे स्वयं भुगत रहे हैं। 
और जहां तक उनके द्वारा कमलनाथ की सुरक्षा कवच बनने का सबाल है यह दिग्विजय सिंह का मूल और सच्चा स्वरूप नहीं है। यह कमलनाथ भी अच्छी तरह से जानते होंगे कि यदि दिग्विजय सिंह चाहते तो कमलनाथ कब के मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन जाते? यह दिग्विजय सिंह ही हैं जिन्होने दो दो बार कमलनाथ के हाथ में आई मुख्यमंत्री की कुर्सी नीचे से खींची थी। एक बार 1985 में जब मोतीलाल वोरा के स्थान पार कांग्रेस है कमान कमलनाथ के लिए पूरी तरह से तैयार था किन्तु दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ के स्थान पार अर्जुन सिंह के विकल्प के रूप में मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बनवाया। मुझे अच्छी तरह से याद है और उस रात को प्रदेश के जानकार राजनीतिक कार्यकर्ता और पत्रकार कैसे भूल सकते हैं कि जब प्रदेश की पूरी राजनीति में भारी परिवर्तन की आधार शिला रखी गई थी। जब कांग्रेस हाईकमान को बताया गया कि मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने कांग्रेस के सारे कांग्रेसी विधायकों को ठाकुर हरवंश सिंह के चार इमली के  बंगले में बंधक बनाकर रखा हुआ है। उस समय राज्य में अपनी ही सरकार को राष्ट्रपति शासन लगाकर अपदस्त करने की भी नौबत आ चुकी थी तब कमलनाथ ने स्वयं को विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया था और हाईकामन की मर्जी का हवाला भी दिया गया था तब भी दिग्विजय सिंह ने ही उसका कड़ा विरोध किया था और प्रदेश का मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा को बना दिया गया था। एक बार 1993 में भी कमलनाथ का नाम हाईकमान द्वारा प्रस्तावित  किया गया था किन्तु वह प्रस्ताव न अर्जुन सिंह को मान्य था और न श्यामाचरण शुक्ल को परिणाम स्वरूप दिग्विजय सिंह शक्तिपरीक्षण में विजयी हुये थे।

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