एक्जिट पोल के आंकड़ों पर तकरार : मीडिया पर हमला…. लगातार तीसरी बार मोदी सरकार

सुरेश शर्मा। चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई है। सात चरण के मतदान के बाद अब चुनाव परिणाम सामने आने ही वाले हैं। मंगलवार को होने वाली मतगणना की तैयारियां भी पूरी हो गई है। परम्परा यह बनती जा रही है कि मतदान के अन्तिम चरण के तत्काल बाद परिणामों का पूर्वानुमान सामने लाया जाता है। सभी प्रमुख टीवी चैनलों ने अपने एजेंसियाें के माध्यम ये ये अनुमान पस्तुत किये हैं। सभी का समान अनुमान यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फिर से सरकार बना रहे हैं। अन्तर यह है कि ज्यादातर 400 के भीतर सीटांे का अनुमान लगा रहे हैं तो एक-दो चैनल के सर्वे 400 पार की बात भी कह रहे हैं। विपक्षी गठबंधन ने भी अपना दावा किया है कि वह 295 सीट जीतकर सरकार बना रहा है। ऐसा दावा गठबंधन के अन्य नेताओं का भी हुआ। ऐसी समानता बैठक के बाद तय हुई बातचीत के आधार पर हुई है। लेकिन जीत की संभावना का भी अपना उत्साह होता हे। वह विपक्ष से अधिक सत्तापक्ष का दिखाई दे रहा है। इसके बाद एक्जिट पोल के अनुमान पर तकरार शुरू हो गई। विपक्षी नेताओं ने इसे अस्वीकार किया। साथ में अनेकों प्रकार के आरोप भी लगाये हैं। विपक्ष्ाी दल मीडिया पर पक्षपात के आरोप इससे पहले भी कई बार लगा चुका है। इस प्रकार के आरोपों का महत्व इसलिए नहीं होता क्योंकि मीडिया के कंधे पर रखकर बन्दुक चलाने से चुनाव नहीं जीत जा सकते हैं। मुकाबला एक ताकतवर संगठन वाली भाजपा से है। उसके चुनाव प्रबंधन से है। ये अनुमान सही होने की स्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तीसरी बार स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बनाने के पंडित जवाहर लाल नेहरू के रिकार्ड की बराबरी कर लेंगे। 1952 से 1967 के आम चुनाव में पंडित नेहरू ने स्पष्ट बहुमत की सरकार का संचालन किया था।

देश में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार को सिलसिला राजीव गांधी की सरकार के बाद समाप्त हो गया था। 31 वर्ष तक देश ने मिलीजुली सरकारों का कामकाज देखा था। 2014 में मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में आने का बाद देश को स्थिर और स्पष्ट बहुमत वाली सरकार मिली। इस प्रकार की सरकार का स्वाद कितना हितकारी और स्वादिष्ट है यह आम व्यक्ति की समझ में आया। इसलिए मिलीजुली सरकार के प्रयासों को जनता ने कोई खास भाव नहीं दिया। यही एक्जिट पोल के अनुमान कह रहे हैं। चुनाव परिणाम की इसी संभावना पर यह कहा जा सकता है कि पंडित नेहरू ने देश में तीन बार सरकार बनाई। 1951-52 में 489 सीटों पर मतदान हुआ था जिसमें से कांग्रेस को 364 सीटें मिली थीं। 1957 के आम चुनाव में 505 सीटों वाले सदन में कांग्रेस को 371 सीटें मिली जबकि 1962 के आम चुनाव में 508 सदस्यों वाले सदन में कांग्रेस को नेहरू की अगुवाई में 361 सीटें मिलीं। अर्थात पंडित नेहरू ने दूसरे आम चुनाव में तो समर्थन बढ़ाया लेकिन तीसरे चुनाव में उन्हें अपेक्षानसार समर्थन नहीं मिला। लेकिन स्पष्ट बहुमत की सरकार का उन्होंने संचालन किया। आजादी के महानायकों में से एक पंडित नेहरू जो जनसमर्थन स्वभािवक रूप से एकतरफा मिलना ही था। आजाद भारत में सत्ता के बदलाव की कल्पना दो-चार चुनाव में नहीं की जा सकती थी। जिस समय प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी तीसरी बार स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बना रहे हैं तब उनके पास ऐसा कोई ऐतिहासिक पक्ष नहीं है जिससे जनमानस की सहानुभूति स्वभाविक रूप से मिल सके।

मोदी ने अपने पुरूषार्थ से यह ख्याति अर्जित की है। उनके साथ देश को आजाद कराने जैसा उल्लेखनीय और गौरवमयी कारण नहीं जुड़ा हुआ है। लेकिन उन्होंने देश को सांस्कृतिक गुलामी से मुक्ति दिलाई यह सम्मानित कारण जरूर जुड़ा है। यदि तीसरी बार की सरकार भी पिछली बार से अधिक सीटों के साथ बनती है तब दूसरे कारण से भी नरेन्द्र मोदी प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से आगे दिखाई देंगे। नेहरू के व्यक्तित्व की तुलना करना मकसद न होकर यह राजनीतिक आधार की तुलना की जा रही है। जिस रणनीति से भाजपा आगे बढ़ रही है उसका विकल्प तैयार करने की क्षमता किसी भी विपक्षी नेता में दिखाई नहीं दे रही है। प्रसिद्धि प्राप्त करने के दो आधार होते हैं। एक विवादित होकर और दूसरा कुछ विशेष करके। विपक्ष विवाद पैदा करके अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है जबकि प्रधानमंत्री मोदी विवादों के बीच अपने काम से ख्याति अर्जित कर रहे हैं। उनकी नीतियों की वैश्विक स्तर पर तारीफ हो रही है। यह तीसरी बार की जीत का बड़ा आधार है। यह आम चुनाव ऐसा था जिसका परिणाम चुनाव शुरू होते ही तय हो गया था। मतदाता ही यह प्रचार कर रहा था कि मोदी की सरकार बन रही है। इस अजीब किस्म की लहर का अनुमान लगाने में परेशानी नहीं थी। विपक्षी दलों ने चुनाव की चुनौती पेश करने की मंशा बनाई ही नहीं। रेस में दिखाई ही नहीं दिये। पुराने और दिग्गज नेताओं ने चुनाव में मानो हिस्सेदारी ही नहीं ली। चार-पांच युवा नेताओं(बालकों) ने जरूर हंगामा दिखाने का प्रयास किया।
भाषा की गिरावट वाला यह चुनाव इसी अंजाम तक आना था। चुनाव परिणाम का सर्वे करके पूर्वानुमान बताने वाली संस्थाओं में

कोई भी ऐसा नहीं है जिसने राजग को 342 से कम दिया हो जबकि ऊपर के स्तर पर दो ने 401 और एक ने 415 भी दिया है। इन पूर्वानुमानों से यह साफ हो गया कि राजग को पिछले चुनाव के 353 से अधिक सीटें मिल ही जायेंगी। जिन सर्वे करने वाले संस्थानों की बात चर्चा में है उनमें से एक का अनुमान 72 प्रतिशत सही रहा है बाकी का अनुमान 80 से 92 प्रतिशत तक सटीक बैठा है जबकि 99.6 प्रतिशत तक सटीक अनुमान वाले संस्थान ने इस बार राजग को 361-401 सीट मिलने का अनुमान जताया है। इससे विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित आंकडे भी इसी के सही रहे हैं। आज अरूणाचल प्रदेश के आये परिणाम भी अनुमान के अनुसार ही रहे हैं। इसलिए सरकार के हैट्रिक लगाने की संभावना से कोई इंकार नहीं कर रहा है।

चुनाव प्रचार में जनता को प्रभावित करने वाले विषयों पर ध्यान कम रहा। एक दूसरे पर कीचड़ उछाले का प्रयास ज्यादा होता रहा। पांच चरण के मतदान तक विपक्ष शान्त बैठा रहा। क्योंकि उसे चुनाव एकतरफा दिख रहा था। सर्वोच्च न्यायालय ने पहल करके दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को अन्तरिम जमानत दी। कांग्रेस के खजाने को सील के करने के बाद माली हालत में सुधार के समाचार आये। इसके बाद प्रचार में कुछ सुधार दिया। तब तक देरी हो चुकी थी। भाजपा ने बहुत ही कसा और सधा हुआ प्रचार किया। प्रधानमंत्री प्रत्येक चरण में अलग रणनीति के आधार पर प्रचार का एजेंडा सैट करते रहे और विपक्षी नेता उसी के आसपास घूमते रहे। जब प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के घोषणा पत्र से एक मुद्दा उठाया और उसको मंगलसूत्र के साथ जोड़ा तब सोशल मीडिया और विपक्ष्ाी दलों के प्रचार का वह आधार बन गया। मोदी उसको चर्चा में छोड़कर अपनी बात मतदाता को समझने लग गये। कभी खटाखट बोलकर विपक्षी युवा नेताओं को खेल करने का साधन दे गये और पूरे चुनाव में खेला कर दिया।

दस साल की सरकार को मतदाता को बताने के लिए पर्याप्त आधार था। जबकि विपक्षी दल महंगाई, बेरोजगारी और सुरक्षा जैसे विषयों को उठाते रहे। लेकिन वे जनता को अपने साथ जोड़ नहीं पाये। महंगाई का जवाब अर्थव्यवस्था को तीसरे स्तर पर ले जाने का आकर्षण प्रीाावी नहीं हाेने दे रहा था। बेरोजगारी से निपटने के लिए ऐसी कई योजनाएं हैं जो युवाओं को समझ में आ रही हैं और स्टार्टअप कई जगहों पर सफल हुए हैं। इन सभी चुनाव के प्रचार के मुद्दों पर सांस्कृतिक घटनाक्रमों ने अधिक प्रभाव डाला है। राम मंदिर का निर्माण ऐसा विषय है जिसका तोड़ विपक्ष के पास नहीं है। िवपक्षी दल मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करते रहे तो मोदी ने उसका तोड़ सनातन का खुलकर सहारा लेकर निकाल लिया। भाजपा के वोट में इजाफा होने का मतलब ही यही है कि इस बार हिन्दू मतदाता भी एक साथ वोट देने के आदत डाल रहे हैं। निजी स्वार्थों से देश के हित को ऊपर रखने की मानसिकता ने बहुसंख्यक समाज में मतदाता के रूप में खासी एकता बनाई है। एक समय था जब फतवे सरकार बनाते थे आज फतवों को कथाकारों और संतों ने बेअसर कर दिया है। इसलिए मोदी लगातार तीसरी बार सरकार बना रहे हैं। हर बार सीटों की संख्या बढ़ाकर पंडित नेहरू के रिकार्ड तोड़कर खुद को अव्वल दिखा रहे हैं। संवाद इंडिया

(लेखक हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन के चेयरमैन हैं)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button