‘ऋषि’ हों या कोई और हम क्यों हैं इतने ‘उतावले’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। एक बात सबसे पहले साफ कर देना चाहता हूं कि किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति ने यह नहीं कहा है कि ब्रिटेन में हिन्दू राजा आ गया है और सब ठीक हो जायेगा? हम गुलामी का बदला ले लेंगे? केवल इतनी सी बात है कि एक ऋषि सुनक नामक व्यक्ति जिसके पूर्वज हिन्दूस्थान से थे वह आज ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बना है। जिस बात के लिए वह पिछले प्रयास में पिछड़ गया था वह यह था कि वह हिन्दू है और वहां इसाईयत शासन का धर्म है? यही बात उस समय उछाली गई थी। लेकिन बना इसलिए क्योंकि कोई भी ऐसा नेता इन दिनों संसद में नहीं है जो ब्रिटेन की हालातों को संभाल सके। इसलिए ऋषि सुनक के हाथ में देश की कमान सौंपी गई है। वह अपने देश के प्रति वफादार हैं और इसी खूबी का उनको फायदा मिला है। यह मामूली सी एक बात हो सकती है कि अपने पूर्वजों के देश के प्रति सहानुभूति उसके मन में हो। लेकिन यह उनके निर्णयों में दिखाई देगी ऐसा संभव नहीं है। हम भारतीय तो इतने भावुक होते हैं कि हमें तो केजरीवाल में समाज सुधारक दिख जाता है और उन्हें सरकार दे देते हैं। लेकिन जिनने देश को, समाज को दिशा दी है उनको हम सम्मान देने के लिए तरसा रहे हैं। इसलिए सुनक के व्यवहार के बाद हमें इतना उतावलापन दिखाना चाहिए। उतावलापन उनके काम के लिए भी खतरनाक हो सकता है।

हिन्दू आस्था ही ऐसी है कि उसमें विश्वास का अतिरेक है। हमने आताताइयों को मसीहा माना है। हम ओंरगजेब को महान मान सकते हैं लेकिन महाराणा प्रताप को आदर्श मानने को तैयार नहीं हैं। हम बाबर के लिए देश जला सकते हैं लेकिन श्रीराम का एक मंदिर देने के लिए पांच सौ बरस का इंतजार करवा सकते हैं। हमें दीवाली के एक दिन के पटाखों में पर्यावरण का खतरा दिखता है लेकिन बाकी जगह धर्मनिरपेक्षता को खतरे है इसलिए कोई आदेश नहीं दे सकते? इसलिए ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन जाते हैं तब हम अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सकते। क्योंकि यह हमारा स्वभाव है। ऋषि सुनक हो या कोई और नेता वे कभी खुलकर ऐसा इजहार नहीं करते कि वे धर्म के लिए काम करते हैं। मोदी यदि मंदिरों का विस्तार कर रहे हैं यह  आस्था के लिए नहीं अपितु हिन्दू मदिरों का धन सरकार के खजाने में पहले से रखा है उसका सही इस्तेमाल कर रहे हैं। बता रहे हैं कि आंग्रेजों ने जो हिन्दू मंदिरों के रखरखाव के नाम पर चढ़ावा लेना शुरू किया था और कांग्रेस की पहली सरकार ने भी उसे बरकरार रखा उसको समाज को सौंप रहे हैं।

इसलिए भावनाओं से उपर आकर हम इस बात पर विचार करें कि कोई भी देश जब संकट में होता है तब वह धर्म विस्तार का काम नहीं करता बल्कि पहले अपने पांव को लडखड़ाने से बचाने का काम करता है फिर कोई और प्रधानमंत्री बनता या ऋषि सुनक बन गये हों। हमें उतावलापन दिखाने की बजाए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्या हमारा कोहीनूर हीरा वापस देने में वे हमारी मांग मानेंगे? क्या अंग्रेजों ने अन्य बेसकीमती वस्तुओं को हथिया रखा था वे हमें देंगे। और यदि सच है तो आजादी जो लीज पर मिलने की बात की जाती है उसे प्रमानेंट करेंगे? पहले देखिए, फिर इतराइये?

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