‘उपेन्द्र’ की गुगली से असहाय दिख रहे हैं ‘नीतीश’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। बिहार का महागठबंधन आयाराम गयाराम का प्रयार्य हो रहा है। भाजपा को रोकने के लिए नीतीश कुमार और लालू यादव एक साथ आ गये थे। अन्य दलों ने सत्ता की बहती गंगा में हाथ धो लिये थे। नीतीश ने नैतिकता और ईमानदारी का बहाना लेकर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली थी। आम चुनाव में भाजपा को तो ताकतवर हो गई लेकिन जदयू का काम लग गया। नीतीश को पहले सीएम प्रोजेक्ट कर रखा था इसलिए भाजपा ने उन्हें ही मौका दिया। नीतीश का जमीर जरूर इससे खत्म हो गया। भाजपा बड़ा दल था उसके मंत्री थे और जदयू छोटा दल होने के बाद भी सीएम उनका था। इसलिए नीतीश ने एक बार फिर से पलटी मार ली और चाचा भतीजा की सरकार बन गई। दस लाख रोजगार देने का वादा तेजस्वी ने किया था अब उसको पूरा करने का दायित्व नीतीश बाबू पर आ गया। यह उलझन थी ही। इसके बाद उनके शिक्षा मंत्री ने अशिक्षित जैसी बात करके नीतीश के सामने परेशानी पैदा कर दी। रामचरित्र मानस को लेकर विवाद पैदा कर दिया। अब यहां आकर लगने लगा सुशासन बाबू अपनी सरकार को संभालने की स्थिति में नहीं हैं और उन्होंने तेजस्वी के सामने आत्म समपर्ण कर दिया है। भाजपा के साथ विलय की बजाए राजद के साथ जाने में जद को रहेगा ही। लेकिन बात यहीं कहां रूकने वाली थी?

उपेन्द्र कुशवाह पहले अलग दल बनाकर राजग के साथ गठबंधन में थे। महत्वाकांक्षी और स्वामी प्रयाद मौर्य की भांति बड़बोले भी थे। इसलिए भाजपा से नहीं बनी। वहां से चलता होने के साथ ही अपनी पार्टी का जदयू में विलय कर दिया। जदयू की समस्या यह है कि वह मोदी का विरोध करती हैं तब न तो जनता उस पर विश्वास करती है और न ही नेतागण। नीतीश का भाजपा के साथ इतना लम्बा चलना उनके लिए अविश्वास का सबसे बड़ा कारण है। यही कारण है कि उनके एकता प्रयासों को भाव नहीं मिला। उन्हें भाजपा का मोहरा ही माना जाता है। कब मोदी की गोदी में बैठ जायें किसको पता? इसलिए नीतीश का पहला प्रयास ही फेर हो गया और उन्हें भाजपा का साथ छोडने का बड़ा झटका लगा। अब उनके सामने तेजस्वी के समक्ष आत्म समर्पण करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा है। रही-सही कसर निकाल दी उपेन्द्र कुशवाह ने। उन्होंने कह दिया कि जदयू कमजोर हो गया। नीतीश की सरकार चला-चली की बेला में है। यह माना जाने लग गया कि उपेन्द्र कुशवाह घूम फिर कर भाजपा के साथ जा सकते हैं। वे पार्टी में शामिल होंगे या पार्टी बनायेंगे इसकी तय होना बाकी है।

उपेन्द्र भाजपा के साथ जायेंगे और विचाराधारा को स्वीकार करने की बात मान लेंगे तो उनको सरकार का संचालन का काम मिल सकता है। यदि वे विचार को स्वीकार नहीं करेंगे तब की स्थिति में वे बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन करने के लिए अपनी पार्टी का गठन कर लेंगे। अभी तो जदयू के साथ हिसाब-किताब बाकी है। उसका निपटारा होने जा रहा है। बयान दर बयान परत उधड़ रही है। कुछ दिखने लग गया कुछ दिखने वाला है। लेकिन बेचरे नीतीश की हालात अजीब हो गई हे। बिहार की जनता की समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर नीतीश ने भाजपा का साथ क्यों छोड़ा था? क्या इसे ही राजनीतिक आत्महत्या कहते हैं?

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