‘इतिहास’ पढऩे भर का नहीं उससे लेते हैं ‘सबक’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। एक बात बहुत दिनों तक समझ में नहीं आती है कि इतिहास महज पढऩे के लिए नहीं सबक लेने के लिए होता है। जिसने भी इतिहास से सबक नहीं लिया वह उसी में दर्ज हो जाता है। अब अध्याय के अक्षरों को रंग काला हो स्वर्णीम। यह तो करने वाले पर निर्भर करता है कि वह अक्षर का रंग किस प्रकार का तय करता है। बंगाल विधानसभा के चुनाव के बाद की हिंसा की बात हो या फिर कोरोना के संकट में देश में बिछ रही लाशों की बात हो। सभी ओर से इतिहास से सबक नहीं लेने वाली बातें अधिक सामने आ रही हैं। यदि राज्यों को संभाल पाने में केन्द्र सरकार कामयाब नहीं होगी तो विदेशों की हुंकार को थामने का पुराना इतिहास कहां से सबक दे रहा है यह दिखाई देगा? पाकिस्तान की बात ही ले लीजिए। डोजियर सौंपने की परम्परा पुरानी सरकारों की ओर से विरासत में मिली थी। जब मोदी काल में सबसे अधिक जवान मारे गये तब यह डोजियर का खेला चला था। पाक की जांच एजेंसी हमारे घर में जांच करने भी आ धमकी थी लेकिन बाद में माजरा समझ में आया तो न अब डोजियर जा रहा है और न ही पाक को जज बनने का मौका दिया जा रहा है। यह है इतिहास से सबक लेना। लेकिन यह संघीय व्यवस्था में दिखाई नहीं दे रहा है। कई राज्यों की सरकारें अपना दबाव बना रही है जबकि ममता सरकार की बात तो उससे भी निराली ही है।

ऐसा तो विभाजन के समय हुआ था जब कार्यकर्ताओं को मारा जाता था। विभाजन के समय जो लोग भारत आ रहे थे उनको मारा गया और इतिहास उससे रंगा पड़ा है। हमने बंगाल चुनाव के बाद उसे देखा लेकिन सीख नहीं ली। देश को पता लगना चाहिए कि मोदी देश की सोचते हैं महापुरूष तो वे खुद ही हो जायेंगे? इतिहास की किताब पढ़ो आपको चाणक्य और चन्द्रगुप्त का किस्सा कहीं भी नहीं दिखाई देता। महाराणा प्रताप और शिवाजी भी नहीं दिखाई देते। पृथ्वीराज चौहान तो गायकी तक सिमट गये। पढ़ाया जाता है कि अकबर महान थे। इतिहास की किताब इनके खानदान से ही शुरू होती है और इन्हीं पर खत्म हो जाती है। आजादी गांधी और नेहरू ने दिलवायी जबकि ताकत के बल पर आजादी लेने का आन्दोलन करने वाले इतिहास से गायब हैं। इसलिए ही कहा जाता है कि इतिहास पढऩे के लिए नहीं सबक लेने के लिए अधिक होता है। आज की सरकार को देश के लोगों ने चुना है। उन लोगों ने जिनके वंशज यही पैदा हुये और यहीं पर ही जलाये गये। इसलिए इतिहास से सबक लेने की सलाह है।

आज कल हमारा न्यायालय गुस्से में है। वह सरकारों को आदेश दे रहा है। विषम काल है देना भी चाहिए। लेकिन कभी अस्पतालों में गरीब की कट रही जेब उसको भी देख लें। उनको भी डांट फटकार हो जाये। कभी उन उद्योगों को या कारपोरेट को भी फटकार दीजिए जो इस कोरोना काल में बिना आय वाले की जेब को कुतर रहे हैं? लेकिन सरकार और अधिकारियों पर डपट से साख बन जाये तो कोई जोखिम क्यों उठायेगा? न्यायालय ब्यूरोक्रसी को धमका तो रहा है लेकिन उसका काम एक दिन करके भी देख ले। व्यवस्था सुधारने के लिए इतिहास से सबक लेने की जरूरत है। लेकिन तकलीफ यह है कि सबक ले कौन?

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