आज के युवा भारत में कहां हैं गांधीवाद ?

नित्यानंद शर्मा । कई बार यह विरोधाभाष मन को उद्वेलित करता है कि आजादी का मंत्र गांधी ने फूंका था और अंग्रेजों ने गांधी के शान्ति दर्शन से प्रभावित होकर देश को आजाद कर दिया? अनेकों बार यह भी विचार पनपता और बिगड़ता रहता है कि गांधीवाद ही भारत के लिए सबसे श्रेष्ठ तरीका है? फिर भी गांधी के सिद्धान्त प्रभावित करते हैं। तब सवाल यह उठता है कि गांधीवाद आज के युवा भारत के लिए स्वीकार्य होना चाहिए या फिर गांधी हमारे कर्मों पर परदा डालने का साधन बन गया है? गांधी ने अपने ही जीवनकाल में अपने आदर्शों को सत्ता की भेंट चढ़ते देखा और मौन हो गये। ऐसा कैसे हो सकता है कि गांधी के साथ सरदार पटेल तो प्रमुखता नहीं पा सकते थे और पंडित नेहरू जो गांधी विचारों के करीब भी नहीं ठहरते थे पंसददीदा हो जाते हैं। गांधी एक लंगोटी में आदर्श स्थापित करते हैं नेहरू के कपड़े ही पैरिस में धुलने जाते हैं। गांधी सत्य की खोज करते हैं नेहरू उतने ही मस्तमौला हैं। सभी किस्म के शौक आजमाते हैं। तब क्या गांधीवाद आज का युवा भारत स्वीकार करेगा और उसे करना चाहिए? गांधी अपने जीवन में धर्म का साथ लेते हैं और यहीं से उन्हें महात्मा कहा जाने लगता है। वे भारत की आजादी को अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलकर पाने की बात करते हैं लेकिन इस बात की कोई अनदेखी नहीं कर सकता कि उनके इस प्रयास से भारत का क्रान्तिकारियों को आन्दोलन ठंडा होने लगता है और उन्हें अंग्रेजों की सजा का सामना करना पड़ता है। यहां तक की सुभाषचन्द्र बोस को भी भारत के बाहर जाना पड़ता है? तब भी गांधी के कार्यों की सराहना मिलनी चाहिए? लेकिन वह मिलती है और उन्हें एक दर्शन के रूप में स्वीकार्यता मिलती है। गांधी भारत का पर्याय बनते हैं और उनको विश्व का सम्मान हासिल होता है। फिर ऐसा क्या है कि भारत जैसे देश में जहां वे भगवान की भांति अवतारित पुरूष के रूप में देखे गये हत्या जैसी स्थिति तक पहुंचना पड़ता है। गांधी की हत्या को उनके विरोधी वध कहते थे। इतने विरोधाभाषों के बीच गांधी विचार विश्व की जरूरत है। उसे स्वीकार भी किया जाता है। स्वीकार करना आदर्श है या जरूरत इसका अन्तर समझने की जरूरत भी हमें महसूस होती है। विश्व में फैली अशान्ति ही उनके दर्शन की जरूरत का अहसास कराती है। यहां आकर भारत और विश्व में अन्तर हो जाता है। भारत कमें हिंसा प्रायोजित है मौलिक नहीं है। इस्लामिक देशों में हिंसा मौलिक है। इसलिए गांधी की जरूरत वहां अधिक है। आजादी के बाद गांधी का झुकाव भी मुस्लिम समाज की तरफ अधिक हो गया था। उनके विचारों से नेहरू को परहेज तो था ही लेकिन उनकी मांग को नेहरू भी मानने के लिए तैयार नहीं थे। पाक को हर्जाने के रूप में 63 करोड़ देने की मांग को नेहरू ने ही बेतुकी बताया था।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि गांधीवाद आज की युवा भारत को जरूरत है? या फिर राष्ट्रवाद आज की सत्ता का आधार है उसे ही ओ ले जाने की जरूरत है। वर्तमान सरकार का संचालन करने वाले विचार ने भी गांधीवादी समाजवाद को स्वीकार किया है। लेकिन यह स्वीकार करना होगा गांधीवाद अब कम स्वीकार्य हो गया। गांधी के वंशज ही गांधी के विचार के विपरीत देश में अचरण कर रहे हैं। तुषार गांधी के विचार नफरत की पौध बोकर भाईचारे की मंशा रखते हैं। तब गांधीवाद की किससे अपेक्षा की जानी चाहिए। गांधी के साथ गोडसे का इस रूप में पेश होना भी शोध का विषय है। आखिर आज गोडसे की निंदा जिस तरीके से की जाती है उससे गोडसे गांधी के बराबर ाड़ा होता दिाख्ता है। राजनेता गोडसे को गाली में गांधी समर्थकों की सहानुभूति की आस लगाये रहते हैं। जबकि गांधी की तुलना गोडसे की हिंसा से नहीं की जा सकती है। यह राम का देश है जो विभिक्षण को का नाम ही स्वीकार नहीं करता वह गोडसे को कैसे स्वीकारेगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button