अयोध्या के बाद मथुरा वाया काशी

कोर्ट के सर्वे से एक बार फिर राष्ट्रवाद का उबाल (सुरेश शर्मा )।  इन दिनों दो ही विषय सबसे अधिक सुर्खियां बटोर रहे हैं। पहला काशी का विश्वनाथ मंदिर व ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे और दूसरा प्लेसेस आफ वर्सिप एक्ट 1991। दोनों ही मामलों में देश की सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप हुआ है और अब मामला जिला कोर्ट बनारस में यह सब विचार किया जायेगा। यह सारा मामला इसलिए भी गभीर है कि अयोध्या के बाद मथुरा का विषय उठा था। लेकिन बीच में काशी पहले आ गया। काशी मतलब बनारस से है और कहा जाता है कि सृष्टि निर्माण से पहले काशी थी। यहां भगवान शिव ने खुद पार्वती को ज्ञान दिया था। ज्ञानवापी वही स्थान है। जहां काशी ज्योतिर्लिंग स्थापित है। यह धारणा उस समय ताकतवर हो गई जब बनारस कोर्ट के निर्देश के बाद ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे करवाने का आदेश हुआ और कोर्ट कमीश्ररों ने सर्वे किया। सर्वे के बाद न्यायालय ने जो आदेश दिया उसने हिन्दू मान्यताओं को पुष्ट कर दिया ऐसा संदेश मिला है। जिस स्थान की ओर वर्षों से नंदी बाबा देख रहे हैं वहीं पर शिवलिंग का मिलना हिन्दू समाज के लिए उत्साह की बात है। इस उत्साह का परिणाम यह हुआ कि देश भर में इस प्रकार के मामले उठाने और न्यायालय में ले जाने की होड़ मच गई। लेकिन कानून के जानने वाले कुछ लोग और मुस्लिम समाज विशेष रूप से प्लेसिस आफ वर्शिप एक्ट 1991 की अधिक चर्चा कर रहा है। अयोध्या में बाबरी ढ़ांचा गिरने के बाद नरसिंह राव सरकार ने सन्तुलन बनाने के लिए यह कानून बनाया था जिसका लब्बो लुवाब यह है कि 15 अगस्त 1947 के दिन जिस भी पूजा स्थल का जो स्टेटस है वही बरकरार रहेगा। इस विषय पर न्यायालय के अपने अभिमत हैं और समाज के अपने।

जिला न्यायालय बनारस के आदेश के बाद ज्ञानवापी मस्जिद में तीन दिन तक सर्वे किया गया। सर्वे में जो तथ्य सामने आये चौंकाने वाले हैं। जहां मुस्लिम समाज के लोग वजु करते थे वहां एक सुन्दर सा शिवलिंग मिलने का दावा किया गया। मुस्लिम समाज ने इसे फव्वारा बता कर मामले को शान्त करने का प्रयास किया गया। लेकिन न्यायालय में दी गई तर्कों के आधार पर वह फव्वारा प्रमाणित नहीं हो पाया इसलिए देश की सबसे बड़ी अदालत ने आदेश देकर वजु के लिए वैकल्पित व्यवस्था करने आदेश दिया। यूपी सरकार ने भी ऐसी व्यवस्था पहले से करने की जानकारी कोर्ट को दी। ज्ञानवापी सर्वे में कई और ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर यह दावा किया जा सकता है कि शिव मंदिर को तोडक़र वहां मस्जिद का आकार दिया गया था। इतिहास में इस प्रकार की घटनाओं की भरमार है कि मुगल आक्रांताओं ने हिन्दू मंदिरों को तोडक़र मस्जिदें बनवाईं और अपने को ताकतवर होने का प्रमाण पेश किया।

देश में पिछले कुछ वर्षों से यह प्रस्तुत किया जा रहा है कि यह हिन्दू और मुसलमान की लड़ाई है। जबकि यह सत्य नहीं है। सत्य यह है कि यह दो धर्मों के बीच में चल रही उस कसरत का परिणाम है जहां बर्बरता के धार्मिक स्थल तोड़े गये और दूसरा सहिष्णु समाज उसे न्याय के माध्यम से वापस मांगने का प्रयास करता रहा है। पाच सौ वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद राम मंदिर मामले मेंं हिन्दू समाज को अधिकार मिला। इसी के बाद अन्य क्षेत्रों की लड़ाई कानून के मंदिर में पहुंच गई। हमें अयोध्या, काशी और मथुरा के बारे में बात करते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि ये सभी स्थान हिन्दू मान्यताओं के आधार पर किसी भी अन्य पंथ की प्रमुख मान्यताओं से कम नहीं हैं। सनातन धर्म विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है और इसकी मान्यताएं वैज्ञानिक हैं इसके बाद भी इसके धार्मिक स्थलों ने अन्य धर्म के शासकों के क्रुर बर्ताव का सामना करना पड़ा। यह सब इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। अन्तर केवल इतना है कि इसे मुखरता इन दिनों अधिक दी जा रही है। संचार साधनों में यदि सभी पंथों की गतिविधियों को इतनी ही गंभीरता से इरादे के साथ दिखाया जायेगा तो इस पंथ से अधिक भयावह स्थिति अन्य पंथों में दिखाई देगी। इसाइयित में सेवा की आड़ में धर्मान्तरण की गति भयावह स्थिति तक पहुंच चुकी है। इस्लाम में लव जिहाद से आबादी सन्तुलन का जो खेल खेला जा रहा है उसकी चर्चा भी समय की मांग है। सनातन धर्म में ऐसी डरावनी स्थिति नहीं है क्योंकि वहां दूसरा के यहां हस्तक्षेप न करके अपने जरूरी स्थानों की वापसी की कसरत भर हो रही है।

धार्मिक सन्तुलन की बात को इससे आगे बढ़ाया जाये तो चिंता उस समय अधिक हो जाती है जब आजादी के 75वें वर्ष में भी हम हिन्दू मान्यताओं को सम्मान देने की बजाए मुगलों के अत्याचारों का समर्थन करते देखते हैं। 15 अगस्त 1947 के उस दिन की कल्पना करना होगी जब पाकिस्तान जाने की बजाए अनेक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार हिन्दूस्थान में ही रूक गये थे। उन्होंने भारतीयता को अधिक महत्व देकर इस्लामिक देश की अवधारणा को अमान्य किया था। क्या इन घरानों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वे आगे आयें और गंगा जमुनी तहजीब का अनुपम उदाहरण पेश करते हुए कुछ प्रमुख हिन्दू मान्यताओं के अतिक्रमित स्थलों को सम्मान के साथ हिन्दू समाज को सौंपने की पहल करें। लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। इस प्रकार की पहल राजनीतिक कारणों से प्रारंभ ही नहीं हो सकती है। तब क्या यह आशंका पैदा नहीं होगी कि ये प्रतिष्ठित परिवार भारत में से एक और पाकिस्तान की संभावना को देखते हुए रूके थे? हालांकि अभी इस पर अधिक सोचने का समय नहीं आया है।

ज्ञानवापी सर्वे ने हिन्दू समाज की आंखें खोलने का काम किया है। मुगलों की हिन्दू मंदिरों के साथ तोडफ़ोड़ को उजागर किया है। यहां सवाल यह भी उत्तर मांग रहा है कि क्या विश्व में केवल इसाइयत और इस्लाम को ही विस्तार का अधिकार है? हिन्दू समाज को विस्तार तो छोडि़ए अपने आस्था के केन्द्रों को मांगने का अधिकार भी नहीं है? उसे कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार ने बंधक बना लिया था। पहले मुगलों ने मंदिरों को तोड़ा और मस्जिद बनाकर उन्हें बंधक बनाया और कांग्रेस की 1991 की सरकार ने एक कानून बनाकर हिन्दू समाज के अधिकारों को बंधक बना दिया था। यह तो देश की सर्वोच्च अदालत के विद्वान न्यायाधीशों का विवेक है कि उन्होंने इस प्रकार के धर्मस्थलों को हाइब्रिड कह कर कानून को उसकी नैतिकता बता दी।

आज यह दिखाई दे रहा है कि अयोध्या से काशी और उसके बाद मथुरा को प्राथमिकता के आधार पर मुक्त कराने का प्रयास किया जायेगा। इसके लिए सोमनाथ से यात्रा शुरू करने की जरूरत नहीं है। यूपी के चुनाव परिणामों ने जनता की भावनाओं को जता दिया। केन्द्र की सरकार के हल्फनामों ने समाज के विश्वास की ओर संकेत दे दिया है। ऐसे में अब समाजों को तय करना है कि वे गंगा जमुनी तहजीब की ओर आगे बढऩा चाहते हैं या फिर न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा करेंगे। मामले का निराकरण तो अन्तिम परिणाम के बाद ही सामने आयेगा। सैंकड़ों वर्षों की तपस्या और अनेक परिवारों की ओर से दायर किये गये मुकदमें यह बताते हैं कि तड़प तो कभी कम नहीं हुई थी लेकिन उन्हें आवाज देने का प्रयास नहीं हुआ। हिन्दू संतों ने अयोध्या मामले में खासा प्रयास किया। लेकिन कुछ शंकराचार्य गण इस मामले में अपने पद के अनुरूप काम करने की अपेक्षा पर सवालों के दायरे में आ गये। लेकिन वे भी यही चाहते हैं कि अयोध्या के बाद काशी वाया मथुरा पहुंचा जाये। भारत की संस्कृति की विशेषता यही है कि वह आतंक के दम पर कब्जा करने की अन्य संस्कृतियों की पिछलग्गु नहीं बनना चाहती। वह तो अपनी विशिष्ट मान्यताओं को साथ लेकर चलती है। वह तो यही सोचती है कि कभी तो श्रीराम की भांति उन पर भी भगवान श्रीशिव और श्रीकृष्ण का स्नेह बरसेगा। इतना जरूर इन दिनों दिखाई दे रहा है कि सनातन धर्म की स्वर्णीम काल एक बार फिर से दिखाई देने लग गया है। इसमें सभी धर्मों का सम्मान और सभी मान्यताओं की रक्षा की भावना है। बस अन्य पंथ भी ऐसा ही करेंगे तो भारत विश्व में फिर से धर्मगुरू बनकर अपना परचम लहरायेगा। अब वाया काशी मथुरा पर रफ्तार तेज हो गई है।
 संवाद इंडिया

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