‘अधिकारी’ की सर्विस रूल बुक खास है या ‘नाफरमानी’

भोपाल। पिछले कुछ वर्षों से अधिकारियों में एक विशेष प्रकार की प्रजाति का तेजी से निर्माण हुआ है। उसका ताजा संस्करण हैं अलपन

(सुरेश शर्मा)

बंदोपाध्याय। वैसे तो इस प्रकार की प्रजाति सभी क्षेत्रों में पाई जाति है और यही प्रजाति उस पेशे को दूषित भी करती है। लेकिन चकाचौंध और संपर्क उसके बारे में न तो बगावत करने की अनुमति देते हैं और न ही साहस। क्योंकि जामने से लडऩे की परम्परा वाले व्यक्ति को पागल कहा जाता है और यह पागल बनने का समय नहीं है ऐसा कह कर समझा दिया जाता है। लेकिन इसका दुख उन सभी क्षेत्रों में अधिकांश को होता है जिस भी क्षेत्र की इस प्रजाति की बात चलती है। अलपन उपाध्याय को लेकर कुछ समाचार पत्रों और तर्कवीरों ने सर्विस रूल बुक की बात करके उनके पक्ष को जायज ठहराने का प्रयास किया। यह भी एक ऐसा तरीका है जिससे इस प्रजाति का संरक्षण करने वाली दूसरी प्रजाति सक्रिय हो जाती है। उसे कुछ लोग टुकड़े-टुकड़ं गेंग भी कहते हैं। यह कानून की किताब में लिखा होगा कि किसी भी राज्य काडर के अधिकारी को केन्द्र में बुलाने से पहले राज्य की सहमति लेना जरूरी है। लेकिन यह सब सामान्य परिस्थितियों के लिए बनाये गये नियम हैं। जबकि अलपन सर तो देश के शासनाध्यक्ष के सामने नाफरमानी के दोषी हैं। ममता का बैठक में न आना बहिष्कार हो सकता है लेकिन अलपन सर का नहीं।

यह माना कि देश तानाशाह नहीं लोकतांत्रिक है। यह केवल एक संस्था पर लागू नहीं किया जा सकता है। केन्द्र के निर्णय की समीक्षा की जा रही है तब अलपन सर की गतिविधियों की समीक्षा से परहेज क्यों? हमारे निजी पूर्वाग्रह किसी व्यवस्था को थोड़े ही बदल देंगे? इसलिए बंदोपाध्याय के कारनामों की चर्चा भी करना चाहिए और एक अधिकारी की राजनीतिक गतिविधियों की सीमाओं का निर्धारण भी करना चाहिए। जब हम सर्विस बुक की बात करते हैं तब अधिकारी को कितना राजनीतिक होना चाहिए और कितना अधिकारी होना चाहिए इसकी बात को भी गौर करना चाहिए। प्रदेश में विपक्ष की राजनीतिक चाल को नाकामयाब करने के लिए प्रशासन तंत्र हमेशा सरकार के साथ खड़ा होता है क्योंकि वह भी सरकार ही होता है। लेकिन आपदा के समय प्रधानमंत्री स्वयं बैठक ले रहे हों तब मुख्यसचिव का विलम्ब से आना नाफरमानी है। मुख्यमंत्री राजनीतिक व्यक्ति होता है इसलिए उसे विरोध या बायकाट करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन एक अधिकारी द्वारा ऐसा करना अपराध है।

बंदोपाध्याय को सलाहकार बनाना ममता दीदी का अधिकार है लेकिन वे सलाहकार थे इस अपराध की सजा देना केन्द्र सरकार का काम है जो उसने कर दिया। इस प्रजाति को समाप्त करने की दिशा में हालांकि कोई भी राजनीतिक नेतृत्व या दल काम नहीं करेगा। क्योंकि उसके साथ भी तो ऐसे ही तत्व होते हैं। वे तत्व तब तक चलते रहते हैं जब तक किसी दूसरे प्रभावशाली के टारगेट में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि इस प्रकार की प्रजाति के लिए सर्विस रूल बुक को देखने की बजाये उसकी वफादारी और नाफरमानी को देखना चाहिए। जिसमें अलपन सर गच्चा खा गये।

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